“घुटने टेकना” मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग / Ghutne Tekna Meaning In Hindi


Ghutne Tekna Muhavare Ka Arth Aur Vakya Prayog / घुटने टेकना मुहावरे का क्या मतलब होता है?



मुहावरा- “घुटने टेकना”।

(Muhavara- Ghutne Tekna)


अर्थ- हार या पराजय स्वीकार करना / आत्मसमर्पण कर देना / किसी के आगे झुक जाना।

(Arth/Meaning in Hindi- Haar Ya Parajay Swikar Karna / Atmsamrpan Kar Dena / Kisi Ke Aage Jhuk Jana)



“घुटने टेकना” मुहावरे का अर्थ/व्याख्या इस प्रकार है- 


परिचय:

हिंदी भाषा की सुंदरता और प्रभावशीलता का एक बड़ा कारण उसके मुहावरे और लोकोक्तियाँ हैं। मुहावरे कम शब्दों में गहरे अर्थ को प्रकट करते हैं और भाषा को जीवंत बनाते हैं। दैनिक जीवन, साहित्य, राजनीति और समाज—हर क्षेत्र में मुहावरों का प्रयोग विचारों को अधिक सशक्त ढंग से प्रस्तुत करता है। ऐसा ही एक प्रसिद्ध और अर्थपूर्ण मुहावरा है “घुटने टेकना”। यह मुहावरा संघर्ष, पराजय, विवशता और आत्मसमर्पण जैसी स्थितियों को व्यक्त करता है।


मुहावरे का शाब्दिक अर्थ:

“घुटने टेकना” का शाब्दिक अर्थ है किसी व्यक्ति का अपने घुटनों के बल बैठ जाना। प्राचीन समय में यह क्रिया विशेष रूप से युद्ध या राजदरबार से जुड़ी हुई थी। जब कोई पराजित राजा, योद्धा या अपराधी विजेता या शासक के सामने हार स्वीकार करता था, तब वह घुटनों के बल बैठकर अपनी पराजय और अधीनता दर्शाता था। इस शारीरिक क्रिया से ही आगे चलकर यह मुहावरा विकसित हुआ।


मुहावरे का भावार्थ:

भावार्थ की दृष्टि से “घुटने टेकना” का अर्थ है—हार मान लेना, विरोध छोड़ देना, दबाव में झुक जाना या विवश होकर समर्पण कर देना। जब कोई व्यक्ति या समूह लंबे संघर्ष, कठिन परिस्थितियों या किसी शक्तिशाली विरोधी के सामने अपने प्रयास बंद कर देता है, तब कहा जाता है कि उसने घुटने टेक दिए। यह मुहावरा केवल शारीरिक हार नहीं, बल्कि मानसिक और नैतिक पराजय को भी दर्शाता है।


ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ:

इतिहास में “घुटने टेकना” की भावना अनेक घटनाओं से जुड़ी हुई है। युद्धों में पराजित सेनाएँ विजेता के सामने आत्मसमर्पण करती थीं। सामाजिक व्यवस्था में भी कमजोर वर्ग कई बार शक्तिशाली वर्ग के अत्याचारों के आगे विवश होकर झुक जाता था। इसी प्रकार राजनैतिक आंदोलनों में, जब किसी आंदोलन को दबाव या परिस्थितियों के कारण समाप्त करना पड़ता है, तो कहा जाता है कि आंदोलन ने घुटने टेक दिए। इस प्रकार यह मुहावरा समाज की शक्ति-संतुलन की वास्तविकता को उजागर करता है।


दैनिक जीवन में प्रयोग:

दैनिक जीवन में इस मुहावरे का प्रयोग बहुत सामान्य है। उदाहरण के लिए—

*लगातार असफलताओं से परेशान होकर यदि कोई व्यक्ति अपना प्रयास छोड़ दे, तो कहा जाता है कि उसने परिस्थितियों के आगे घुटने टेक दिए।

*यदि कोई कर्मचारी अत्यधिक दबाव के कारण अपने अधिकारों की लड़ाई छोड़ दे, तो यह भी “घुटने टेकना” कहलाता है।

*खेल के क्षेत्र में भी जब कोई टीम या खिलाड़ी मुकाबले के बीच ही हार स्वीकार कर लेता है, तो इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है।


मानसिक और भावनात्मक अर्थ:

“घुटने टेकना” केवल बाहरी परिस्थितियों से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसका गहरा संबंध मनुष्य की मानसिक स्थिति से भी है। कई बार व्यक्ति शारीरिक रूप से सक्षम होता है, लेकिन डर, तनाव, निराशा या आत्मविश्वास की कमी के कारण वह संघर्ष जारी नहीं रख पाता। ऐसी स्थिति में यह मुहावरा व्यक्ति की आंतरिक हार को दर्शाता है। यह हमें यह भी समझाता है कि मानसिक दृढ़ता के बिना किसी भी संघर्ष में टिके रहना कठिन होता है।


“घुटने टेकना” मुहावरे का वाक्य प्रयोग / Ghutne Tekna Muhavare Ka Vakya Prayog.


1.लगातार असफलताओं के बाद भी उसने घुटने टेकने से इंकार कर दिया।

2.कठिन परिस्थितियों में कई लोग संघर्ष छोड़कर घुटने टेक देते हैं।

3.आर्थिक संकट के आगे अंततः कंपनी को घुटने टेकने पड़े।

4.सच्चा योद्धा कभी भी समस्याओं के सामने घुटने नहीं टेकता।

5.दबाव में आकर उसने अपने सिद्धांतों के साथ घुटने टेक दिए।

6.कड़ी मेहनत के बावजूद जब सफलता नहीं मिली, तब वह घुटने टेक बैठा।

7.अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाला व्यक्ति आसानी से घुटने नहीं टेकता।

8.लगातार आलोचनाओं के बाद भी कलाकार ने हालात के सामने घुटने नहीं टेके।

9.कई बार लोग डर के कारण सच के सामने घुटने टेक देते हैं।

10.कठिन परीक्षा देखकर कुछ छात्रों ने पहले ही घुटने टेक दिए।

11.सच्चाई की ताकत के आगे झूठ को अंततः घुटने टेकने पड़े।

12.बीमारी के कारण उसे परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने पड़े।

13.जो व्यक्ति मेहनत से भागता है, वह जल्दी ही चुनौतियों के सामने घुटने टेक देता है।

14.सैनिक ने घायल होने पर भी दुश्मन के सामने घुटने नहीं टेके।

15.समाज के दबाव में आकर उसने अपने सपनों के साथ घुटने टेक दिए।

16.कठिन समय में धैर्य खो देने से इंसान जल्दी घुटने टेक देता है।

17.उसने साबित कर दिया कि साहस रखने वाला व्यक्ति हालात के सामने घुटने नहीं टेकता।

18.भ्रष्टाचार के आगे ईमानदारी को कभी घुटने नहीं टेकने चाहिए।

19.शुरुआत में संघर्ष कठिन था, लेकिन उसने घुटने टेकने के बजाय प्रयास जारी रखा।

20.जो लोग हार से डरते हैं, वे बिना लड़े ही घुटने टेक देते हैं।


निष्कर्ष:

अंततः कहा जा सकता है कि “घुटने टेकना” मुहावरा मानव जीवन के संघर्ष, पराजय, विवशता और निर्णयों की सच्चाई को प्रकट करता है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कब संघर्ष जारी रखना चाहिए और कब परिस्थितियों को स्वीकार कर आगे बढ़ना चाहिए। सही संदर्भ में इसका प्रयोग भाषा को प्रभावशाली, भावपूर्ण और सजीव बनाता है। इसी कारण यह मुहावरा हिंदी भाषा में आज भी अत्यंत प्रासंगिक और अर्थपूर्ण है।





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