“घर में भुजी भांग न होना” मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग / Ghar Me Bhuji Bhang Na Hona Meaning In Hindi
Ghar Me Bhuji Bhang Na Hona Muhavare Ka Arth Aur Vakya Prayog / घर में भुजी भांग न होना मुहावरे का क्या मतलब होता है?
मुहावरा: “घर में भुजी भांग न होना” ।
(Muhavara- Ghar Me Bhuji Bhang Na Hona)
अर्थ- बहुत गरीब होना / अत्यंत दरिद्र होना / घर में खाने पीने तक का अभाव होना ।
(Arth/Meaning in Hindi- Bahut Garib Hona / Atyant Daridra Hona / Gha Me Khane Pine Tak Ka Abhav Hona)
“घर में भुजी भांग न होना” मुहावरे का अर्थ/व्याख्या इस प्रकार है-
परिचय:
हिंदी भाषा में मुहावरों का विशेष स्थान है। मुहावरे कम शब्दों में गहरी और प्रभावशाली बात कहने का माध्यम होते हैं। वे भाषा को जीवंत, रोचक और भावपूर्ण बनाते हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध मुहावरा है — “घर में भुजी भांग न होना”। यह मुहावरा आम बोलचाल में भी सुनने को मिलता है और साहित्यिक रचनाओं में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
मुहावरे का शाब्दिक अर्थ:
इस मुहावरे को यदि शब्दशः देखें तो इसका अर्थ होगा — घर में भुनी हुई भांग तक न होना। भांग एक सस्ती और आसानी से मिलने वाली वस्तु मानी जाती थी, और उसे भूनकर रखना भी बहुत सामान्य बात थी। अर्थात यदि किसी घर में भुजी भांग भी न हो, तो समझा जाता था कि उस घर की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है।
भावार्थ:
“घर में भुजी भांग न होना” मुहावरे का भावार्थ है —
अत्यधिक गरीबी होना, घर में खाने-पीने तक का अभाव होना, या इतनी बदहाली होना कि साधारण से साधारण वस्तु भी उपलब्ध न हो।
यह मुहावरा उस स्थिति को दर्शाता है जब किसी व्यक्ति या परिवार के पास जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की भी कमी हो।
मुहावरे की उत्पत्ति और सामाजिक पृष्ठभूमि:
प्राचीन समय में भांग एक बहुत सस्ती और आम चीज मानी जाती थी। विशेष रूप से ग्रामीण और गरीब वर्ग में इसका प्रयोग सामान्य था। जब कहा जाता था कि घर में भुजी भांग भी नहीं है, तो इसका अर्थ यह होता था कि व्यक्ति की हालत इतनी खराब है कि वह सबसे सस्ती चीज भी नहीं जुटा पा रहा।
इस प्रकार यह मुहावरा समाज की आर्थिक विषमता और गरीबी की स्थिति को बहुत सशक्त ढंग से व्यक्त करता है। यह केवल धन की कमी नहीं, बल्कि जीवन में फैली असहायता और अभाव का भी संकेत देता है।
प्रयोग की स्थिति
इस मुहावरे का प्रयोग प्रायः निम्नलिखित परिस्थितियों में किया जाता है:
*जब किसी व्यक्ति की अत्यधिक गरीबी का वर्णन करना हो
*जब किसी परिवार की बदहाल आर्थिक स्थिति बतानी हो
*व्यंग्य या तंज के रूप में किसी की खोखली शान दिखाने के लिए
उदाहरण के लिए:
*वह बड़ी-बड़ी बातें करता है, लेकिन सच तो यह है कि उसके घर में भुजी भांग न होने जैसी हालत है।
*महंगाई ने गरीबों की कमर तोड़ दी है, कई घरों में भुजी भांग तक नहीं है।
साहित्य में प्रयोग:
हिंदी साहित्य में यह मुहावरा यथार्थवाद को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त हुआ है। प्रेमचंद जैसे लेखक गरीबों की दशा दिखाने के लिए ऐसे मुहावरों का सहारा लेते थे। इससे पाठक को पात्रों की स्थिति को समझने में आसानी होती है और कहानी अधिक प्रभावशाली बनती है।
सामाजिक संदेश:
यह मुहावरा हमें समाज की उस सच्चाई से परिचित कराता है, जहाँ आज भी बहुत से लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। यह केवल एक भाषा का अलंकार नहीं, बल्कि गरीबी, असमानता और सामाजिक जिम्मेदारी की ओर संकेत करता है। इसके माध्यम से हमें यह सोचने की प्रेरणा मिलती है कि समाज के कमजोर वर्गों के लिए क्या किया जा सकता है।
आधुनिक संदर्भ:
आज के समय में भले ही जीवनशैली बदल गई हो, लेकिन इस मुहावरे की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। आज भी जब किसी की आर्थिक हालत बहुत खराब होती है, तो यही कहा जाता है कि घर में भुजी भांग नहीं है। यह मुहावरा समय के साथ अपना मूल भाव बनाए हुए है।
“घर में भुजी भांग न होना” मुहावरे का वाक्य प्रयोग / Ghar Me Bhuji Bhang Na Hona Muhavare Ka Vakya Prayog.
1.उसकी हालत ऐसी है कि उसके घर में भुजी भांग न होने जैसी स्थिति है।
2.बेरोजगारी के कारण कई परिवारों के घर में भुजी भांग नहीं है।
3.वह बाहर अमीरी दिखाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि उसके घर में भुजी भांग न होना साफ दिखता है।
4.सूखे के कारण गाँव के कई घरों में भुजी भांग नहीं बची।
5.कर्ज ने उसकी कमर तोड़ दी, अब तो घर में भुजी भांग भी नहीं है।
6.महंगाई ने गरीबों को ऐसा दबोचा कि घर में भुजी भांग न होने लगी।
7.बीमारी पर सारा पैसा खर्च हो गया और घर में भुजी भांग न होने की नौबत आ गई।
8.वह मदद माँगने आया था, क्योंकि उसके घर में भुजी भांग नहीं थी।
9.मजदूरी न मिलने से उसके बच्चों के घर में भुजी भांग न होना आम बात हो गई।
10.बाढ़ के बाद कई परिवारों के घर में भुजी भांग तक नहीं रही।
11.उसके चेहरे से ही पता चल जाता है कि उसके घर में भुजी भांग नहीं है।
12.अकाल पड़ने से किसानों के घर में भुजी भांग न होने लगी।
13.उसने पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि घर में भुजी भांग नहीं थी।
14.वह दिखावे की बातें करता है, पर असल में उसके घर में भुजी भांग नहीं है।
15.सरकार को चाहिए कि जिनके घर में भुजी भांग नहीं है, उनकी मदद करे।
16.मेहनत न करने का नतीजा यह हुआ कि उसके घर में भुजी भांग न रही।
17.रोज़गार छिनते ही उसके घर में भुजी भांग न होने लगी।
18.कच्चे मकान में रहने वालों के कई घरों में भुजी भांग नहीं होती।
19.संकट के समय उसका घर ऐसा हो गया कि भुजी भांग भी न थी।
20.उसने सच कहा कि उसके घर में भुजी भांग नहीं है।
21.समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जिनके घर में भुजी भांग न होना आम बात है।
22=लंबे इलाज के बाद उसकी आर्थिक हालत ऐसी हो गई कि घर में भुजी भांग नहीं रही।
23.बारिश न होने से गरीबों के घर में भुजी भांग न बची।
24.वह दूसरों की मदद करता रहा, लेकिन उसके अपने घर में भुजी भांग नहीं थी।
25.कठिन समय में उसके घर में भुजी भांग न होने की स्थिति बन गई।
26.गरीबी ने उसे इस हाल में पहुँचा दिया कि घर में भुजी भांग नहीं रही।
27.महामारी के समय कई घरों में भुजी भांग न होना सच्चाई बन गई।
28.मजदूर की हालत देख कर लगा कि उसके घर में भुजी भांग नहीं है।
29.उसने स्वीकार किया कि उसके घर में भुजी भांग न होने जैसी दशा है।
30.हमें उन लोगों के लिए कुछ करना चाहिए जिनके घर में भुजी भांग नहीं है।
निष्कर्ष:
अंततः कहा जा सकता है कि “घर में भुजी भांग न होना” एक अत्यंत प्रभावशाली हिंदी मुहावरा है, जो गरीबी और अभाव की चरम स्थिति को व्यक्त करता है। यह न केवल भाषा की सुंदरता को बढ़ाता है, बल्कि समाज की वास्तविकताओं को भी उजागर करता है। मुहावरों का सही प्रयोग भाषा को सजीव बनाता है और विचारों को अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि हिंदी भाषा में ऐसे मुहावरों का महत्व सदैव बना रहेगा।
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