“घर का बोझ उठाना” मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग / Ghar Ka Bojh Uthana Meaning In Hindi
Ghar Ka Bojh Uthana Muhavare Ka Arth Aur Vakya Prayog / घर का बोझ उठाना मुहावरे का क्या मतलब होता है?
मुहावरा: “घर का बोझ उठाना” ।
(Muhavara- Ghar Ka Bojh Uthana)
अर्थ: घर का खर्च चलाना / घर का देखभाल करना / परिवार की जिम्मेदारी संभालना ।
(Arth/Meaning in Hindi- Ghar Ka Kharch Chalana / Ghar Ka Dekhbhal Karna / Pariwar Ki Zimmedari Sambhalna)
“घर का बोझ उठाना” मुहावरे का अर्थ/व्याख्या इस प्रकार है-
परिचय:
हिंदी भाषा में मुहावरों का विशेष महत्व है। मुहावरे भाषा को प्रभावशाली, सजीव और भावपूर्ण बनाते हैं। वे कम शब्दों में गहरे अर्थ को प्रकट करते हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध और प्रचलित मुहावरा है — “घर का बोझ उठाना”। यह मुहावरा हमारे सामाजिक, पारिवारिक और भावनात्मक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
मुहावरे का शाब्दिक अर्थ:
“घर का बोझ उठाना” का शाब्दिक अर्थ है — घर के ऊपर रखे हुए किसी भारी बोझ को उठाना। लेकिन व्यवहारिक जीवन में इसका यह अर्थ नहीं लिया जाता। यह एक लाक्षणिक मुहावरा है, जिसका प्रयोग विशेष परिस्थितियों में किया जाता है।
मुहावरे का भावार्थ:
“घर का बोझ उठाना” का भावार्थ है — परिवार की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेना। इसमें घर की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक जिम्मेदारियाँ शामिल होती हैं। जब कोई व्यक्ति अपने परिवार के पालन-पोषण, खर्च, शिक्षा, इलाज और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाता है, तब कहा जाता है कि वह “घर का बोझ उठा रहा है”।
यह मुहावरा प्रायः उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है जो कठिन परिस्थितियों में भी परिवार का सहारा बनता है और अपने सुख-दुख को पीछे रखकर परिवार की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देता है।
सामाजिक संदर्भ में मुहावरे की व्याख्या:
भारतीय समाज में परिवार को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यहाँ संयुक्त परिवारों की परंपरा रही है, जहाँ एक सदस्य की जिम्मेदारी पूरे परिवार पर प्रभाव डालती है। ऐसे में जब परिवार का मुखिया असमय मृत्यु को प्राप्त हो जाए, बीमार हो जाए या काम करने में असमर्थ हो जाए, तब किसी अन्य सदस्य को मजबूरी में “घर का बोझ उठाना” पड़ता है।
अक्सर देखा जाता है कि घर का बड़ा बेटा, कभी-कभी बेटी या माँ भी यह जिम्मेदारी निभाती है। वह अपनी पढ़ाई, इच्छाओं और सपनों को त्यागकर घर के खर्च चलाने के लिए काम करने लगती है। ऐसी स्थिति में यह मुहावरा पूरी तरह सार्थक हो जाता है।
आर्थिक दृष्टि से अर्थ:
“घर का बोझ उठाना” केवल भावनात्मक नहीं बल्कि आर्थिक संघर्ष को भी दर्शाता है। महँगाई, बेरोजगारी और सीमित साधनों के बीच परिवार का पालन-पोषण करना आसान नहीं होता। जब कोई व्यक्ति दिन-रात मेहनत करता है, कर्ज चुकाता है, बच्चों की पढ़ाई और माता-पिता के इलाज की चिंता करता है, तब यह कहा जाता है कि वही व्यक्ति घर का बोझ उठा रहा है।
यह मुहावरा त्याग, मेहनत और जिम्मेदारी का प्रतीक है।
भावनात्मक पक्ष:
इस मुहावरे का एक गहरा भावनात्मक पक्ष भी है। घर का बोझ उठाने वाला व्यक्ति अक्सर मानसिक दबाव में रहता है। वह अपनी परेशानियाँ किसी से साझा नहीं कर पाता, क्योंकि उसे परिवार की मजबूती बनाए रखनी होती है। वह बाहर से मजबूत दिखाई देता है, लेकिन अंदर ही अंदर अनेक संघर्षों से जूझता रहता है।
इस दृष्टि से यह मुहावरा केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मबल को भी दर्शाता है।
साहित्य और जीवन में प्रयोग:
हिंदी साहित्य, कहानियों और उपन्यासों में इस मुहावरे का प्रयोग बहुतायत से हुआ है। प्रेमचंद की कहानियों में ऐसे अनेक पात्र मिलते हैं जो गरीबी और सामाजिक विषमताओं के बावजूद घर का बोझ उठाते हैं। यह मुहावरा आम बोलचाल की भाषा में भी खूब प्रयोग किया जाता है।
नैतिक संदेश:
“घर का बोझ उठाना” मुहावरा हमें कर्तव्य, त्याग और पारिवारिक प्रेम का संदेश देता है। यह सिखाता है कि जीवन में केवल अपने बारे में सोचना पर्याप्त नहीं, बल्कि परिवार और समाज के प्रति भी हमारी जिम्मेदारियाँ होती हैं।
“घर का बोझ उठाना” मुहावरे का वाक्य प्रयोग / Ghar Ka Bojh Uthana Muhavare Ka Vakya Prayog.
1.पिता के बीमार पड़ते ही बड़े बेटे को घर का बोझ उठाना पड़ा।
2.कम उम्र में नौकरी करके वह घर का बोझ उठा रहा है।
3.पति की मृत्यु के बाद उस महिला ने अकेले घर का बोझ उठाया।
4.पढ़ाई छोड़कर उसने घर का बोझ उठाने का कठिन निर्णय लिया।
5.गरीबी के बावजूद वह पूरी ईमानदारी से घर का बोझ उठा रहा है।
6.छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी निभाते हुए उसने घर का बोझ उठाया।
7.गांव छोड़कर शहर जाना पड़ा क्योंकि उसे घर का बोझ उठाना था।
8.कठिन परिस्थितियों में भी वह घर का बोझ उठाने से पीछे नहीं हटा।
9.घर का बोझ उठाते-उठाते उसने अपने सपनों को कुर्बान कर दिया।
10.परिवार की उम्मीदें उसी पर थीं, इसलिए वही घर का बोझ उठा रहा था।
11.माता-पिता की जिम्मेदारी निभाते हुए उसने घर का बोझ उठाया।
12.बेरोजगारी के समय भी वह किसी तरह घर का बोझ उठाता रहा।
13.भाई की पढ़ाई के लिए उसने घर का बोझ अपने कंधों पर ले लिया।
14.छोटी उम्र में घर का बोझ उठाना आसान नहीं होता।
15.आर्थिक संकट में वही व्यक्ति घर का बोझ उठाने के लिए आगे आया।
16.अपने दुख छिपाकर वह घर का बोझ उठाता रहा।
17.घर का बोझ उठाने वाले लोग ही परिवार की असली ताकत होते हैं।
18.उसने कभी शिकायत नहीं की, बस घर का बोझ उठाता रहा।
19.पिता के सेवानिवृत्त होते ही बेटे ने घर का बोझ उठा लिया।
20.समाज में वही सम्मान पाता है जो जिम्मेदारी से घर का बोझ उठाता है।
21.घर का बोझ उठाते हुए उसने जीवन का सही अर्थ समझा।
22.आर्थिक तंगी में भी उसने घर का बोझ ईमानदारी से उठाया।
23.मजबूरी में उसे घर का बोझ उठाने के लिए नौकरी करनी पड़ी।
24.परिवार के लिए घर का बोझ उठाना उसका कर्तव्य बन गया था।
25.कठिन समय में घर का बोझ उठाने वाले ही सच्चे रिश्ते निभाते हैं।
26.घर का बोझ उठाते-उठाते वह समय से पहले परिपक्व हो गया।
27.उसने अपने शौक छोड़ दिए क्योंकि उसे घर का बोझ उठाना था।
28.घर का बोझ उठाने की जिम्मेदारी उसी के हिस्से में आई।
29.संकट की घड़ी में वही घर का बोझ उठाने में सक्षम निकला।
30.पूरे परिवार का घर का बोझ अकेले उठाना आसान काम नहीं है।
निष्कर्ष:
अंततः कहा जा सकता है कि “घर का बोझ उठाना” मुहावरा केवल एक भाषा-प्रयोग नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई को दर्शाता है। यह उन असंख्य लोगों की कहानी कहता है जो अपने सपनों को पीछे छोड़कर परिवार के लिए संघर्ष करते हैं। यह मुहावरा हमें ऐसे लोगों के प्रति सम्मान, संवेदना और कृतज्ञता का भाव रखना सिखाता है।
इस प्रकार यह मु
हावरा हिंदी भाषा का एक सशक्त, भावपूर्ण और जीवन से जुड़ा हुआ मुहावरा है।
Comments
Post a Comment