“बंदर और मगरमच्छ” हिंदी शिक्षाप्रद कहानी / Bandar Aur Magarmach Hindi Story


Bandar Aur Magarmachh Hindi Kahani / बन्दर और मगरमच्छ की कहानी । 


कहानी: बंदर और मगरमच्छ

बहुत समय पहले की बात है। एक विशाल, हरे-भरे जंगल के बीचोंबीच एक शांत और गहरी नदी बहती थी। नदी का पानी इतना स्वच्छ था कि उसमें आकाश का प्रतिबिंब साफ दिखाई देता था। नदी के दोनों किनारों पर ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे, जिनकी शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं। इन्हीं पेड़ों में से एक था एक बहुत पुराना और विशाल जामुन का पेड़, जो नदी के किनारे झुका हुआ था। उसकी कई शाखाएँ तो सीधे नदी के ऊपर फैली हुई थीं।

इसी जामुन के पेड़ पर रहता था एक चतुर और बुद्धिमान बंदर। वह न केवल फुर्तीला था, बल्कि समझदार भी था। जंगल के दूसरे जानवर उससे सलाह लेने आते थे। वह सबके साथ प्रेम और सम्मान से पेश आता था। जामुन का पेड़ उसका घर था और मीठे-रसीले जामुन उसका भोजन।

बंदर का जीवन बहुत संतुलित था। वह सुबह-सुबह उठकर नदी का दृश्य देखता, ताज़ी हवा में छलाँगें लगाता और फिर जामुन तोड़कर खाता। दिन भर वह कभी पेड़ों पर खेलता, कभी ध्यान करता और कभी जंगल के अन्य प्राणियों से बातचीत करता। उसे अपने जीवन में किसी चीज़ की कमी नहीं लगती थी।


नदी का निवासी: मगरमच्छ

उसी नदी में रहता था एक मगरमच्छ। वह आकार में बहुत बड़ा था, ताकतवर था, लेकिन बुद्धि में बंदर जितना तेज़ नहीं था। मगरमच्छ अधिकतर समय पानी में ही बिताता था। वह मछलियाँ पकड़कर खाता और कभी-कभी नदी के किनारे धूप सेकता।

मगरमच्छ का स्वभाव उतना बुरा नहीं था, लेकिन वह बहुत जल्दी दूसरों की बातों में आ जाता था। वह अपनी पत्नी से बहुत प्रभावित रहता था। उसकी पत्नी अक्सर उसे यह जताती थी कि वह जंगल के अन्य प्राणियों से कम है, क्योंकि उनके पास खाने-पीने की अच्छी चीज़ें होती हैं।


मित्रता की शुरुआत:

एक दिन बंदर पेड़ पर बैठा जामुन खा रहा था। कुछ जामुन नीचे नदी में गिर गए। मगरमच्छ ने जब उन्हें खाया तो वह उनके स्वाद से बहुत प्रभावित हुआ। उसने ऊपर देखा तो बंदर को देखा।

मगरमच्छ ने कहा,

“मित्र, ये फल बहुत स्वादिष्ट हैं। क्या तुम मुझे रोज़ ऐसे फल दे सकते हो?”

बंदर मुस्कुराया। उसे दूसरों की मदद करना अच्छा लगता था। उसने कहा,

“क्यों नहीं मित्र! यह पेड़ मेरा घर है, लेकिन इसके फल सबके लिए हैं।”

यहीं से दोनों की मित्रता शुरू हुई। रोज़ बंदर जामुन तोड़कर नदी में डाल देता और मगरमच्छ उन्हें खा लेता। धीरे-धीरे दोनों में बातचीत बढ़ने लगी। वे एक-दूसरे के जीवन के बारे में जानने लगे। बंदर अपनी बुद्धिमत्ता की बातें करता और मगरमच्छ नदी की गहराइयों के किस्से सुनाता।


पत्नी की लालसा:

कुछ समय बाद मगरमच्छ ने अपनी पत्नी को भी जामुन खिलाए। मगरमच्छनी को जामुन बहुत पसंद आए, लेकिन उसके मन में एक और ही विचार जन्म लेने लगा। उसने सुना था कि बुद्धिमान और अच्छे भोजन खाने वाले प्राणियों का हृदय बहुत स्वादिष्ट होता है।

उसने मगरमच्छ से कहा,

“तुम रोज़ जामुन खाते हो, लेकिन क्या तुम जानते हो कि बंदर का हृदय कितना स्वादिष्ट होगा? वह रोज़ इतने मीठे फल खाता है। मुझे उसका हृदय चाहिए।”

मगरमच्छ यह सुनकर चौंक गया।

“वह मेरा मित्र है। मैं उसे धोखा कैसे दे सकता हूँ?”

लेकिन मगरमच्छनी ने चालाकी से कहा,

“यदि तुम सच में मुझसे प्रेम करते हो, तो मेरे लिए यह छोटा-सा काम नहीं कर सकते?”

मगरमच्छ दुविधा में पड़ गया। मित्रता और पत्नी के बीच वह फँस गया। कई दिनों तक वह परेशान रहा, लेकिन अंततः उसने पत्नी की बात मान ली।


विश्वासघात की योजना:

एक दिन मगरमच्छ ने बंदर से कहा,

“मित्र, मेरी पत्नी तुमसे मिलना चाहती है। क्या तुम मेरे साथ नदी के उस पार चलोगे?”

बंदर ने कभी नदी पार नहीं की थी, लेकिन उसे मगरमच्छ पर पूरा भरोसा था। उसने सोचा, “मित्र की पत्नी है, मिलने में क्या बुराई है?”

वह मगरमच्छ की पीठ पर बैठ गया। मगर जैसे-जैसे वे नदी के बीच पहुँचे, मगरमच्छ का स्वभाव बदलने लगा। उसका चेहरा गंभीर हो गया।

बंदर ने पूछा,

“मित्र, तुम कुछ परेशान लग रहे हो?”

मगरमच्छ ने संकोच करते हुए सच बता दिया,

“मित्र, मुझे माफ़ करना। मेरी पत्नी तुम्हारा हृदय चाहती है।”


बुद्धि की परीक्षा:

यह सुनकर बंदर घबरा गया, लेकिन उसने धैर्य नहीं खोया। वह जानता था कि घबराहट से कुछ हासिल नहीं होगा। उसने तुरंत अपनी बुद्धि का प्रयोग किया।

उसने शांत स्वर में कहा,

“अरे मित्र, तुमने पहले क्यों नहीं बताया? मेरा हृदय तो मैं पेड़ पर ही छोड़ आया हूँ। हम बंदर अपना हृदय शरीर में नहीं रखते।”

मगरमच्छ सरल स्वभाव का था। वह बातों में आ गया।

“तो फिर हमें वापस चलना चाहिए,” उसने कहा।

जैसे ही वे पेड़ के पास पहुँचे, बंदर फुर्ती से छलाँग लगाकर पेड़ पर चढ़ गया।

ऊपर से उसने कहा,

“मित्र, मूर्ख मत बनो। कोई भी जीव बिना हृदय के जीवित नहीं रह सकता। तुमने मित्रता को स्वार्थ के लिए बेच दिया।”


शिक्षा और पश्चाताप:

मगरमच्छ शर्मिंदा हो गया। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सिर झुका लिया और बोला,

“मित्र, मैंने बहुत बड़ी भूल की। कृपया मुझे क्षमा कर दो।”

बंदर ने उत्तर दिया,

“क्षमा तभी संभव है जब इंसान अपनी गलती से सीख ले। मित्रता विश्वास से चलती है, लालच से नहीं।”

मगरमच्छ ने जीवन भर यह बात याद रखी। उसने फिर कभी किसी के बहकावे में आकर गलत काम नहीं किया। उसकी पत्नी को भी अपनी गलती का एहसास हुआ।


कहानी से मिलने वाली सीख:

इस कहानी से हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ मिलती हैं:

बुद्धिमत्ता बल से अधिक शक्तिशाली होती है।

सच्ची मित्रता विश्वास पर आधारित होती है।

लालच और स्वार्थ अंततः विनाश का कारण बनते हैं।

संकट के समय धैर्य और विवेक से काम लेना चाहिए।

गलती स्वीकार करना और उससे सीखना ही सच्चा सुधार है।

बंदर अपनी बुद्धि से बच गया और मगरमच्छ अपने अनुभव से समझदार बना। जंगल फिर से शांत हो गया, और जामुन का

 पेड़ आज भी नदी के किनारे खड़ा होकर इस कहानी को याद दिलाता है।



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