“चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए” मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग / Chamdi Jaye Par Damdi Na Jaye Meaning In Hindi
Chamadi Jaye Par Damadi Na Jaye Muhavara Ka Arth Aur Vakya Prayog / चमड़ी जाये पर दमड़ी ना जाए मुहावरे का क्या मतलब होता है?
मुहावरा: “चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए”।
(Muhavara- Chamdi Jaye Par Damdi Na Jaye)
अर्थ: अत्यधिक कंजूस होना ।
(Arth/Meaning In Hindi- Atyadhik Kanjoos Hona)
प्रस्तावना:
हिंदी भाषा में मुहावरों का विशेष महत्व होता है। मुहावरे भाषा को प्रभावशाली, रोचक और जीवंत बनाते हैं। इनके प्रयोग से कम शब्दों में गहरी बात कही जा सकती है। “चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए” एक प्रसिद्ध हिंदी मुहावरा है, जो मनुष्य के स्वभाव में मौजूद अत्यधिक कंजूसी को दर्शाता है। यह मुहावरा ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है जो धन के प्रति इतना मोह रखता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी पैसा खर्च करना पसंद नहीं करता।
मुहावरे का शाब्दिक अर्थ:
इस मुहावरे में “चमड़ी” का अर्थ शरीर की त्वचा से है और “दमड़ी” पुराने समय के एक बहुत छोटे सिक्के को कहा जाता था। शाब्दिक रूप से इसका अर्थ है — चाहे शरीर को कष्ट हो जाए, लेकिन एक छोटी-सी रकम भी खर्च न करनी पड़े।
यह अतिशयोक्ति के माध्यम से व्यक्ति की अत्यधिक कंजूसी को व्यक्त करता है।
भावार्थ:
“चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए” मुहावरे का भावार्थ है — बहुत अधिक कंजूस होना या धन खर्च करने से हर हाल में बचना। ऐसे लोग अपने धन को इतना प्रिय मानते हैं कि जरूरत पड़ने पर भी खर्च नहीं करते। वे स्वयं कष्ट सह लेते हैं, लेकिन पैसा खर्च करना उन्हें अच्छा नहीं लगता।
यह मुहावरा उन लोगों के लिए कहा जाता है जो अपने स्वार्थ और धन-संचय के कारण दूसरों की सहायता करने से भी बचते हैं।
व्याख्या:
समाज में अनेक प्रकार के लोग होते हैं। कुछ लोग दानी और उदार होते हैं, जबकि कुछ अत्यधिक कंजूस होते हैं। कंजूस व्यक्ति केवल धन इकट्ठा करने में विश्वास रखता है। वह अपने आराम, स्वास्थ्य और आवश्यकताओं की भी अनदेखी कर देता है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति बीमार होने पर भी डॉक्टर के पास जाने से बचता है ताकि पैसे खर्च न हों, तो उसके लिए यह मुहावरा उपयुक्त है। इसी प्रकार कुछ लोग दूसरों के सुख-दुख में सहयोग करने से भी बचते हैं। वे हर समय पैसे बचाने की सोचते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों के व्यवहार को देखकर लोग कहते हैं — “इस पर तो चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए वाली कहावत बिल्कुल सही बैठती है।”
यह मुहावरा केवल धन के प्रति मोह को ही नहीं दर्शाता, बल्कि यह भी बताता है कि आवश्यकता से अधिक कंजूसी मनुष्य के व्यक्तित्व को संकीर्ण बना देती है। धन जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन धन को ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बना लेना उचित नहीं है।
सामाजिक संदेश:
यह मुहावरा हमें संतुलित जीवन जीने की सीख देता है। मनुष्य को फिजूलखर्ची नहीं करनी चाहिए, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर उचित स्थान पर धन खर्च करना भी जरूरी है। जरूरतमंदों की सहायता करना, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना और परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना एक जिम्मेदार व्यक्ति का कर्तव्य है।
अत्यधिक कंजूसी व्यक्ति को समाज में सम्मान नहीं दिलाती। लोग ऐसे व्यक्ति से दूरी बनाना पसंद करते हैं। इसके विपरीत उदार और सहयोगी व्यक्ति समाज में आदर प्राप्त करता है।
“चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए” मुहावरे का वाक्य प्रयोग / Chamadi Jaye Par Damadi Na Jaye Muhavare Ka Vakya Prayog.
1.रमेश इतना कंजूस है कि उसके लिए “चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए” मुहावरा बिल्कुल सही बैठता है।
2.दादा जी टूटी हुई चप्पल पहन लेते हैं, लेकिन नई नहीं खरीदते; सचमुच चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
3.वह बीमार होने पर भी डॉक्टर के पास नहीं गया, क्योंकि उसकी सोच थी — चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
4.मोहन शादी में भी सस्ते कपड़े पहनकर गया, उसकी आदत है चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
5.सेठ जी मजदूरों को पूरी मजदूरी देने में भी कंजूसी करते हैं, मानो चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
6.रीना अपनी पुरानी किताबें ही इस्तेमाल करती रही, क्योंकि उसके पिता का स्वभाव था चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
7.वह मेहमानों के आने पर भी खर्च करने से बचता है; सच में चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
8.अमित बस का किराया बचाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चल लेता है, उसकी हालत चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए जैसी है।
9.दुकानदार ग्राहकों को पानी तक नहीं पूछता, क्योंकि वह चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए वाला आदमी है।
10.वह अपने बच्चों की पढ़ाई पर भी पैसा खर्च नहीं करना चाहता, चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए उसकी पुरानी आदत है।
11.गाँव के लोग उस सेठ को चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए कहकर चिढ़ाते हैं।
12.पिताजी ने कहा कि जरूरत के समय खर्च करना चाहिए, हर समय चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए ठीक नहीं।
13.वह अपने दोस्त की मदद भी नहीं करता, क्योंकि उसकी सोच है चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
14.राहुल नया मोबाइल खरीद सकता था, लेकिन उसने पैसे बचाने के लिए पुराना ही चलाया; सचमुच चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
15.वह खुद भूखा रह लेता है, लेकिन किसी को पैसे नहीं देता; यही तो है चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
16.हमारे पड़ोसी इतने कंजूस हैं कि बिजली बचाने के लिए रात में लाइट भी नहीं जलाते, जैसे चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
17.माँ ने समझाया कि अधिक कंजूसी करना अच्छी बात नहीं, हर समय चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए नहीं होना चाहिए।
18.वह त्योहार पर भी मिठाई खरीदने से बचता है, क्योंकि उसकी आदत है चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए।
19.शर्मा जी इलाज में देर करते रहे और बीमारी बढ़ गई, क्योंकि वे चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए वाले इंसान थे।
20.जरूरत पड़ने पर धन खर्च करना चाहिए, नहीं तो लोग चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए कहने लगते हैं।
उपसंहार:
“चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए” हिंदी का एक प्रचलित और सार्थक मुहावरा है, जो अत्यधिक कंजूसी करने वाले व्यक्ति के स्वभाव को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है। यह मुहावरा हमें यह शिक्षा देता है कि धन का महत्व अवश्य है, लेकिन धन के मोह में मानवता, स्वास्थ्य और सामाजिक संबंधों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जीवन में संतुलन और उदारता ही व्यक्ति को सच्चा सम्मान दिलाती है।
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