“खजाने की खोज” हिंदी शिक्षाप्रद कहानी / Khajane Ki Khoj Story In Hindi
Khajane Ki Khoj Hindi Kahani / Kahani Khajane Ki Khoj / हिंदी कहानी खजाने की खोज।
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| Khajane Ki Khoj |
कहानी: “खजाने की खोज”।
जयपुर के पास एक छोटा-सा गाँव था—सूरजपुर। गाँव के चारों ओर हरे-भरे खेत, एक पुराना तालाब और दूर तक फैली अरावली की पहाड़ियाँ थीं। सूरजपुर के बीचों-बीच एक प्राचीन बरगद का पेड़ खड़ा था, जिसके नीचे बच्चे हर शाम खेला करते थे।
गाँव में दो सबसे अच्छे दोस्त रहते थे—आरव और मीरा। दोनों कक्षा आठ में पढ़ते थे और पढ़ाई में अच्छे होने के साथ-साथ जिज्ञासु भी थे। आरव को पुरानी चीज़ों और नक्शों में बहुत रुचि थी, जबकि मीरा को किताबें पढ़ना और पहेलियाँ सुलझाना पसंद था।
एक दिन स्कूल में उनकी अध्यापिका, राधा मैडम, ने बच्चों को एक प्रोजेक्ट दिया—“अपने गाँव के इतिहास के बारे में जानकारी जुटाओ और कुछ नया खोजो।” यह सुनकर आरव और मीरा बहुत उत्साहित हो गए।
“क्यों न हम सचमुच कोई खोज करें?” आरव ने चमकती आँखों से कहा।
“हाँ! शायद हमें कोई पुरानी कहानी या रहस्य मिल जाए,” मीरा मुस्कराई।
उस शाम दोनों दोस्त गाँव के पुराने पुस्तकालय गए। पुस्तकालय में बहुत कम लोग आते थे, इसलिए वहाँ शांति रहती थी। धूल से ढकी अलमारियों के बीच खोजते-खोजते उन्हें एक पुरानी, मोटी किताब मिली—“सूरजपुर का इतिहास।”
किताब के पन्ने पीले पड़ चुके थे। जब मीरा ने उसे खोला, तो एक कागज़ का टुकड़ा नीचे गिरा। वह एक अधूरा-सा नक्शा था। नक्शे पर कुछ चिन्ह बने थे—बरगद का पेड़, तालाब, और पहाड़ी की दिशा में एक लाल निशान।
“यह तो हमारे गाँव का नक्शा लगता है!” आरव ने उत्साह से कहा।
“और यह लाल निशान… शायद खजाने की जगह?” मीरा की आँखों में चमक आ गई।
नक्शे के नीचे एक पंक्ति लिखी थी—
“सच्चा खजाना उसे मिलेगा, जो बुद्धि, साहस और ईमानदारी से काम लेगा।”
दोनों ने तय किया कि वे इस रहस्य की खोज करेंगे। लेकिन उन्होंने यह भी सोचा कि बिना बड़ों को बताए कहीं जाना ठीक नहीं। इसलिए उन्होंने अपने माता-पिता को सब बताया। माता-पिता ने हँसते हुए कहा, “ठीक है, लेकिन सावधानी से जाना और शाम से पहले लौट आना।”
अगली सुबह दोनों दोस्त नक्शा लेकर बरगद के पेड़ के पास पहुँचे। नक्शे के अनुसार पहली निशानी वहीं थी। पेड़ के तने पर ध्यान से देखने पर उन्हें एक छोटा-सा चिह्न दिखा—एक तीर का निशान, जो तालाब की ओर इशारा कर रहा था।
“मतलब अगला सुराग तालाब के पास है,” मीरा ने अनुमान लगाया।
दोनों तालाब की ओर चल पड़े। रास्ते में उन्हें उनका मित्र रोहन मिला। रोहन थोड़ा शरारती था और जल्दी-जल्दी काम करना चाहता था।
“कहाँ जा रहे हो?” रोहन ने पूछा।
आरव ने उसे सब बताया।
“मुझे भी साथ ले चलो!” रोहन बोला।
अब तीनों दोस्त मिलकर खजाने की खोज में निकल पड़े।
तालाब के किनारे एक पुराना पत्थर पड़ा था। पत्थर पर कुछ अक्षर खुदे हुए थे। पर वे मिट चुके थे। मीरा ने ध्यान से देखा और पानी छिड़ककर अक्षरों को पढ़ने की कोशिश की। धीरे-धीरे शब्द स्पष्ट हुए—
“जहाँ सूरज ढले, वहाँ तीन कदम चलो;
जहाँ छाया मिले, वहाँ नीचे देखो।”
“इसका मतलब?” रोहन ने सिर खुजलाया।
आरव ने कहा, “जब सूरज पश्चिम में ढलता है, तो उसकी दिशा में तीन कदम चलना है।”
तीनों ने शाम तक इंतज़ार किया। जैसे ही सूरज ढलने लगा, वे पत्थर से पश्चिम दिशा में तीन कदम चले। वहाँ एक छोटा-सा गड्ढा था, जिसके पास घास उगी थी।
मीरा ने घास हटाई तो नीचे एक छोटी-सी लोहे की चाबी मिली।
“वाह! हमें चाबी मिल गई!” रोहन खुशी से उछला।
नक्शे के अनुसार अगली जगह पहाड़ी की ओर थी। तीनों दोस्त अगले दिन पहाड़ी पर चढ़ने लगे। रास्ता कठिन था, लेकिन वे हिम्मत नहीं हारे।
पहाड़ी पर एक छोटी-सी गुफा थी। गुफा के अंदर अँधेरा था। वे टॉर्च लेकर गए थे, इसलिए अंदर जा सके। गुफा के भीतर एक पुराना लकड़ी का संदूक रखा था, जिस पर ताला लगा था।
“शायद यही खजाना है!” रोहन ने उत्साह में कहा।
आरव ने सावधानी से चाबी ताले में डाली। ताला खुल गया। तीनों ने साँस रोके संदूक खोला।
पर अंदर सोने-चाँदी के सिक्के नहीं थे। वहाँ कुछ किताबें, एक डायरी और एक पत्र रखा था।
रोहन निराश हो गया। “अरे! यह तो बस किताबें हैं!”
मीरा ने पत्र उठाकर पढ़ा। उसमें लिखा था—
“प्रिय खोजकर्ता,
यदि तुम यहाँ तक पहुँचे हो, तो तुमने बुद्धि, साहस और ईमानदारी का परिचय दिया है। यही असली खजाना है। इस संदूक में ज्ञान की पुस्तकें हैं। इन्हें पढ़ो, बाँटो और गाँव को आगे बढ़ाओ।”
नीचे हस्ताक्षर था—गाँव के पुराने सरपंच, जो वर्षों पहले गुजर चुके थे।
तीनों दोस्त एक-दूसरे को देखने लगे।
आरव ने कहा, “शायद यही असली खजाना है—ज्ञान।”
मीरा ने सिर हिलाया, “हाँ, और यह संदेश भी कि हमें मिल-जुलकर काम करना चाहिए।”
डायरी में गाँव के सुधार के कई सुझाव लिखे थे—पुस्तकालय को फिर से शुरू करना, पेड़ लगाना, बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना।
तीनों ने तय किया कि वे इस खजाने को अपने तक सीमित नहीं रखेंगे। वे किताबें लेकर गाँव लौटे और सबको पूरी कहानी सुनाई।
गाँव के लोग पहले तो हँसे, लेकिन जब उन्होंने डायरी पढ़ी, तो उन्हें बात समझ में आई। धीरे-धीरे गाँव में बदलाव आने लगा। पुस्तकालय साफ किया गया। बच्चे रोज़ वहाँ पढ़ने आने लगे। तालाब की सफाई की गई। पेड़ लगाए गए।
रोहन, जो पहले शरारती था, अब सबसे पहले पुस्तकालय पहुँचता और दूसरों की मदद करता।
कुछ महीनों बाद राधा मैडम ने प्रोजेक्ट प्रस्तुत करने को कहा। आरव, मीरा और रोहन ने पूरी कहानी सुनाई।
मैडम मुस्कराईं और बोलीं, “तुमने सचमुच खजाने की खोज की है। सोना-चाँदी खत्म हो सकता है, पर ज्ञान और अच्छे गुण जीवनभर साथ रहते हैं।”
तीनों दोस्तों को पूरे स्कूल से तालियाँ मिलीं।
उस दिन के बाद से सूरजपुर के बच्चों के लिए “खजाने की खोज” सिर्फ एक रोमांचक कहानी नहीं रही, बल्कि एक सीख बन गई—
सच्चा खजाना धन नहीं, बल्कि ज्ञान, साहस, ईमानदारी और मिल-जुलकर काम करने की भावना है।
और इस तरह, एक छोटे-से गाँव में शुरू हुई खोज ने सबकी सोच बदल दी।
बरगद का पेड़ आज भी खड़ा है, जैसे वह मुस्कराकर कह रहा हो—
“खोजो, सीखो और बाँटो—यही जीवन का असली खजाना है।”
सीख:
ज्ञान सबसे बड़ा धन है।
मिल-जुलकर काम करने से बड़ी से बड़ी समस्या हल हो सकती है।
ईमानदारी और साहस से किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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