“घुट-घुट कर मरना” मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग / Ghut Ghut Kar Marna Meaning In Hindi
Ghut Ghut Kar Marna Muhavare Ka Arth Aur Vakya Prayog / घुट घुट कर मरना मुहावरे का क्या मतलब है?
मुहावरा: “घुट-घुट कर मरना”।
(Muhavara- Ghut Ghut Kar Marna)
अर्थ: असहनीय कष्ट सहते हुए मरना / अत्यधिक मानसिक पीड़ा या लाचारी के कारण तड़प तड़प कर मरना।
(Arth/Meaning in Hindi- Asahniya Kasht Sahate Huye Marna / Atyadhik Mansik Pida Ya Lachari Ke Karan Tadap Tadap Kar Marna)
“घुट घुट कर मरना” मुहावरे का अर्थ/व्याख्या इस प्रकार है-
परिचय:
हिंदी भाषा की विशेषता यह है कि वह मानवीय भावनाओं, मानसिक स्थितियों और सामाजिक यथार्थ को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। इस प्रभावशीलता का एक प्रमुख साधन मुहावरे हैं। मुहावरे कम शब्दों में गहरी और व्यापक बात कहने की क्षमता रखते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत मार्मिक और भावनात्मक मुहावरा है — “घुट-घुट कर मरना”। यह मुहावरा मनुष्य के आंतरिक दुख, पीड़ा और विवशता को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत करता है।
शाब्दिक अर्थ:
शब्दशः “घुट-घुट कर मरना” का अर्थ है — सांस रुक-रुक कर, घुटन के कारण मर जाना। इसमें शारीरिक कष्ट और दम घुटने की स्थिति का बोध होता है। लेकिन मुहावरे के रूप में इसका प्रयोग शारीरिक मृत्यु के लिए नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक पीड़ा के लिए किया जाता है।
मुहावरे का भावार्थ:
मुहावरे के रूप में “घुट-घुट कर मरना” का अर्थ है —
*अंदर ही अंदर अत्यधिक दुख सहना
*अपनी पीड़ा किसी से न कह पाना
*मजबूरी में अपमान, अन्याय या अत्याचार सहते रहना
*मानसिक रूप से टूट जाना, लेकिन परिस्थितियों के कारण चुप रहना
अर्थात जब कोई व्यक्ति बाहरी रूप से जीवित दिखाई देता है, लेकिन भीतर से निरंतर दुख, पीड़ा और तनाव में जी रहा होता है, तो कहा जाता है कि वह “घुट-घुट कर मर रहा है।”
मुहावरे की व्याख्या:
यह मुहावरा मानव जीवन की उन परिस्थितियों को उजागर करता है जहाँ व्यक्ति बोल नहीं पाता, विरोध नहीं कर पाता और अपनी भावनाओं को दबाकर जीने के लिए मजबूर होता है। समाज, परिवार, आर्थिक स्थिति या सामाजिक प्रतिष्ठा के भय से वह अपनी पीड़ा को व्यक्त नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप वह मानसिक रूप से टूटता चला जाता है।
यह स्थिति शारीरिक मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक मानी जाती है, क्योंकि व्यक्ति हर दिन जीते हुए भी मरने जैसा अनुभव करता है। उसका आत्मसम्मान, इच्छाएँ और सपने धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं। यही भाव “घुट-घुट कर मरना” मुहावरे के माध्यम से प्रकट होता है।
सामाजिक संदर्भ:
समाज में यह मुहावरा विशेष रूप से उन लोगों के लिए प्रयुक्त होता है जो अन्याय, अत्याचार या दबाव में जीवन जी रहे होते हैं। कई बार महिलाएँ असमान व्यवहार, घरेलू उत्पीड़न या सामाजिक बंधनों के कारण अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर पातीं और चुपचाप सब सहती रहती हैं। ऐसे संदर्भ में कहा जाता है कि वे घुट-घुट कर जी रही हैं।
इसी प्रकार आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, पारिवारिक दबाव या सामाजिक भय के कारण भी व्यक्ति अपनी इच्छाओं का दमन करता है और भीतर ही भीतर टूटता रहता है।
साहित्य में प्रयोग:
हिंदी साहित्य, कहानियों, उपन्यासों और कविताओं में “घुट-घुट कर मरना” मुहावरे का प्रयोग करुणा और संवेदना उत्पन्न करने के लिए किया गया है। लेखक इस मुहावरे के माध्यम से पात्र की मानसिक स्थिति को अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है। पाठक उस पीड़ा को महसूस कर पाता है, जिसे शब्दों में सीधे-सीधे व्यक्त करना कठिन होता है।
उदाहरण के लिए —
“वह अपमान सहते-सहते घुट-घुट कर मरने लगी।”
“अपनी मजबूरी के कारण वह हर दिन घुट-घुट कर जी रहा था।”
इन वाक्यों में व्यक्ति की विवशता, पीड़ा और चुप्पी स्पष्ट झलकती है।
नैतिक और सामाजिक संदेश:
यह मुहावरा केवल पीड़ा का चित्रण नहीं करता, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी भी है। यह हमें संवेदनशील बनने, दूसरों की चुप्पी को समझने और उन्हें बोलने का अवसर देने का संदेश देता है। साथ ही यह व्यक्ति को भी प्रेरित करता है कि वह अपनी पीड़ा को व्यक्त करे, क्योंकि चुपचाप सहते रहना समाधान नहीं है।
“घुट-घुट कर मरना” मुहावरे का वाक्य-प्रयोग / Ghut Ghut Kar Marna Muhavare Ka Vakya Prayog.
1.सामाजिक दबाव के कारण वह अपनी इच्छाओं को दबाकर घुट-घुट कर मर रहा था।
2.अन्याय सहते-सहते वह भीतर ही भीतर घुट-घुट कर मरने लगी।
3.आर्थिक तंगी ने उसे ऐसा जकड़ लिया कि वह हर दिन घुट-घुट कर जी रहा था।
4.अपमानजनक व्यवहार के कारण वह नौकरी में घुट-घुट कर मर रहा है।
5.अपनी बात कह न पाने की मजबूरी में वह घुट-घुट कर मरने को विवश है।
6.पारिवारिक कलह ने उसके जीवन को घुट-घुट कर मरने जैसा बना दिया।
7.समाज के डर से वह अपने दुख छिपाकर घुट-घुट कर मरता रहा।
8.अत्याचार सहते-सहते उसका मन घुट-घुट कर मरने लगा।
9.सपनों को त्यागकर जीना उसके लिए घुट-घुट कर मरने के समान था।
10.लंबे समय तक अकेलापन झेलते हुए वह घुट-घुट कर मर रहा था।
11.सच्चाई न बोल पाने की मजबूरी में वह घुट-घुट कर मरने लगा।
12.हर दिन का ताना उसे घुट-घुट कर मरने पर मजबूर कर देता था।
13.बिना सहारे के जीवन जीना उसके लिए घुट-घुट कर मरने जैसा था।
14.अपनी पीड़ा किसी से न कह पाने के कारण वह घुट-घुट कर मरता रहा।
15.अन्याय के खिलाफ आवाज़ न उठा पाना घुट-घुट कर मरने के समान है।
16.डर और असहायता ने उसे घुट-घुट कर मरने पर मजबूर कर दिया।
17.अपनी भावनाओं को दबाकर जीना घुट-घुट कर मरने जैसा होता है।
18.अपनों की उपेक्षा ने उसे घुट-घुट कर मरने की स्थिति में पहुँचा दिया।
19.लगातार तनाव में जीना घुट-घुट कर मरने के बराबर है।
20.सम्मान के बिना जीवन जीना उसे घुट-घुट कर मरने जैसा लगता था।
निष्कर्ष:
अतः “घुट-घुट कर मरना” मुहावरा मानव जीवन की गहन पीड़ा, मानसिक कष्ट और विवशता को अत्यंत सशक्त रूप में अभिव्यक्त करता है। यह मुहावरा हमें न केवल भाषा की गहराई से परिचित कराता है, बल्कि समाज की उन सच्चाइयों से भी रूबरू कराता है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। सच्चा और स्वस्थ समाज वही है जहाँ कोई भी व्यक्ति घुट-घुट कर जीने को मजबूर न हो, बल्कि सम्मान और स्वतंत्रता के साथ अपने भाव व्यक्त कर सके।
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